श्मशान की राख नहीं, इस विशेष विधि से बनती है महाकाल की भस्म आरती की भस्म
उज्जैन: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शिरोमणि कालों के काल बाबा महाकालेश्वर की नगरी में हर प्रभात एक दिव्य दृश्य अवतरित होता है। विश्वभर में श्री महाकालेश्वर मंदिर ही एकमात्र ऐसा पावन धाम है, जहाँ प्रतिदिन प्रातःकाल अलौकिक भस्म आरती का आयोजन किया जाता है। पौराणिक समय में बाबा महाकाल को श्मशान की भस्म अर्पित करने की प्रथा थी, परंतु वर्तमान युग में ऐसा नहीं है। अब यह पवित्र भस्म महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा एक विशेष धार्मिक प्रक्रिया के माध्यम से निर्मित की जाती है। महानिर्वाणी अखाड़े के संत ही शुक्ल यजुर्वेद के सिद्ध मंत्रों के उच्चारण के साथ यह दिव्य भस्म बाबा महाकाल को समर्पित करते हैं।
कंडे और औषधियों से भस्म निर्माण की विशेष विधि
महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरी महाराज के अनुसार, वर्तमान काल में भस्म तैयार करने के लिए कपिला गाय के कंडों का प्रयोग होता है। इन कंडों के साथ पीपल, वटवृक्ष, शमी, पलाश और बेर की लकड़ियों को अनेक औषधीय सामग्रियों के साथ मिलाया जाता है। इसके पश्चात इन्हें महाकालेश्वर मंदिर परिसर में स्थित अखंड धूनी में समर्पित कर प्रज्ज्वलित किया जाता है। जब अग्नि पूर्णतः शांत हो जाती है, तब उस राख को अत्यंत सावधानी से निकालकर तीन से चार बार महीन कपड़े से छाना जाता है, जिससे परम शुद्ध भस्म प्राप्त होती है।
मंत्रोच्चार के साथ भस्म अर्पण की संपूर्ण प्रक्रिया
भस्म निर्माण में पूर्ण स्वच्छता और पवित्रता का पालन किया जाता है। प्रातःकालीन आरती के समय सबसे पहले भगवान महाकाल का भव्य पूजन, जलाभिषेक और दिव्य श्रृंगार संपन्न होता है। इसके उपरांत शिवलिंग को एक पवित्र श्वेत वस्त्र से आच्छादित कर दिया जाता है। वस्त्र से ढंकने के पश्चात शुक्ल यजुर्वेद के वैदिक मंत्रों की गूंज के बीच साधु-संत यह भस्म बाबा को अर्पित करते हैं। पूजन के दौरान बाबा का सुंदर श्रृंगार भांग, त्रिपुंड, चंद्रमा और बेलपत्रों से संवारा जाता है। इस पावन भस्म को प्रसाद रूप में धारण करने से भक्तों के सर्व पाप, रोग और कष्ट दूर हो जाते हैं।
भस्म श्रृंगार से जुड़ी दो मुख्य पौराणिक कथाएँ
शास्त्रों के अनुसार भस्म धारण की दो अत्यंत प्राचीन कथाएँ प्रचलित हैं। पहली कथा के अनुसार प्राचीन समय में दूषण नामक असुर ने उज्जैन में भारी तबाही मचा रखी थी। तब धर्मनिष्ठ ब्राह्मणों की पुकार पर भगवान शिव ने प्रकट होकर क्रोध में दूषण को भस्म कर दिया और उसकी भस्म से अपना श्रृंगार किया। दूसरी मान्यता के अनुसार, जब माता सती के देहत्याग के पश्चात शिवजी उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब माता सती की भस्म स्पर्श होते ही उनका प्रचंड क्रोध शांत हो गया था। इसी कारण बाबा महाकाल को भस्म अत्यंत प्रिय है और इसे अर्पित करने से मनोवांछित फल मिलता है।
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