राज्यसभा परिणामों में NDA का जलवा, मोदी सरकार की स्थिति हुई और मजबूत
नई दिल्ली। देश में हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा की 26 सीटों के चुनावी समर में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने प्रचंड प्रदर्शन करते हुए 19 सीटों पर एकतरफा कब्जा जमाया है। इस शानदार सफलता के बाद संसद के उच्च सदन में एनडीए की राजनीतिक स्थिति पहले के मुकाबले कहीं अधिक सुदृढ़ हो गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बढ़े हुए संख्या बल से केंद्र सरकार को आगामी सत्रों में महत्वपूर्ण विधायी प्रस्तावों और विधेयकों को बिना किसी बड़े गतिरोध के पारित कराने में भारी राजनीतिक बढ़त मिलेगी। दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी खेमे 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन को इन चुनावों में वैसी कामयाबी नहीं मिल सकी जिसकी उम्मीद जताई जा रही थी; विपक्ष को महज 6 सीटों से संतोष करना पड़ा है, जबकि मिजोरम की एकमात्र सीट वहां के एक क्षेत्रीय दल की झोली में गई है।
झारखंड में क्रॉस वोटिंग से विपक्ष को लगा बड़ा राजनीतिक झटका
इस पूरे चुनावी घटनाक्रम में सबसे बड़ा उलटफेर झारखंड में देखने को मिला, जहां एनडीए के सहयोग से उतरे निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नथवानी ने अप्रत्याशित जीत दर्ज की। विपक्षी एकजुटता के दावों के बीच इस सीट पर हुई क्रॉस वोटिंग ने ऐन वक्त पर पूरे चुनावी समीकरण को ही पलट कर रख दिया, जिसके चलते कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार को पराजय का सामना करना पड़ा। इस परिणाम ने विपक्षी गठबंधन के भीतर की सांगठनिक कमजोरी को सतह पर ला दिया है।
उच्च सदन में एनडीए का बढ़ेगा दबदबा, विधायी कार्यों को मिलेगी गति
राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि इन नवीन चुनाव परिणामों के बाद राज्यसभा में सत्तापक्ष का प्रभाव काफी हद तक बढ़ जाएगा। गठबंधन पहले से ही सदन में मजबूत स्थिति में बना हुआ था, और अब इन नई जीतों के बाद वह सदन के जादुई बहुमत के आंकड़े के और भी करीब पहुंच चुका है। विश्लेषकों के अनुसार, संख्या बल में आया यह बड़ा उछाल केंद्र सरकार को अपने राष्ट्रीय और आर्थिक एजेंडे से जुड़े कानूनों को बिना किसी विधायी अड़चन के लागू करने में मदद करेगा।
विपक्षी एकजुटता के लिए आत्ममंथन का संदेश बने चुनाव परिणाम
राज्यसभा के ये चुनावी नतीजे विपक्ष के लिए गहरे आत्ममंथन और समीक्षा का विषय बन गए हैं। विशेष रूप से झारखंड जैसे राज्य में पार्टी गाइडलाइन से हटकर हुई क्रॉस वोटिंग ने विपक्षी दलों की आंतरिक एकजुटता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। जानकारों का कहना है कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था या संस्था के संचालन में आंतरिक ईमानदारी और कड़ी निगरानी दोनों ही समान रूप से अनिवार्य तत्व होते हैं; यदि इनमें से किसी भी मोर्चे पर कमजोरी आती है, तो पूरी सांगठनिक व्यवस्था की साख पर सवाल उठने लगते हैं। आने वाले समय में सदन के भीतर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच का अंतर और स्पष्ट रूप से परिलक्षित होगा।
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